Saturday, October 15, 2011

प्रशांत भूषण ने देश को धोखा दिया है !

आर के अग्रवाल नाम के एक विसिलब्लोअर ( घोटाला उजागरकर्ता  ) ने बैंक सिस्टम व पब्लिक में नकली करेंसी नोटों की घुसपेठ करने वाले स्टेट बैंक कर्मचारी अभियुक्तों के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में मुकदमे की प्रभावी पैरवी करने हेतु वकील श्री प्रशांत भूषण ( कथित PIL Filing Expert ) को नियुक्त किया था अभियुक्तों की याचिकाएं अलाहबाद उच्च  न्यायालय में वर्ष 2008 में ख़ारिज हो चुकी थी जिसके विरुद्ध अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट में एस एल भी ( क्रिमिनल )    दाखिल कर राखी हैं , श्री प्रशांत भूषण ने प्रभावी पैरवी करने के बजाये अभियुक्तों को अवैध  लाभ लाभी पहुचने हेतु व अपने ही  Client को न्याय में देरी व न्याय से वंचित करने हेतु साजिश  करते हुये अभियुक्तों से सांठ गाँठ कर ली तथा मुक़दमे की पैरवी अभियुक्तों के पक्ष में फिक्स (fix )  कर ली ! श्री भूषण के इस भ्रष्ट कदाचार आचरण की शिकायत पीड़ित  Client ने संवेधानिक संस्था Bar Council of Delhi में याचिका संख्या – 57 /2011 , के द्वारा की है की याचिका में प्रशांत भूषण को किसी भी न्यायालय में Practice करने के का licence लाइसेंस निरस्त करने की प्रार्थना की गयी है !     
       BAR COUNCIL OF DELHI NOTICE COPY TO PRASHANT BHUSHAN …
CORRUPT PRASHANT BHUSHAN

Petition (s) of Special Leave Appeal (crl) No. (s) .2938/2009





Thursday, October 13, 2011

संजीव भट्ट मामले में एन आई ए की गोपनीय जाँच के बाद कांग्रेस की बोलती बंद क्यों??

भारत के इतिहास मे पहली बार किसी भी राज्य सरकार के अधिकारों को चुनौती देते हुए केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने संजीव भट्ट की पत्नी के पत्र को आधार बता कर संजीब भट्ट के मामले की जाँच के लिए केन्द्रीय जाँच एजेन्सी एन आई ए की एक टीम भेजी . ये सरकार किसी भी राज्य सरकार के अधिकार का खुला अत्रिक्रमण था. लेकिन गुजरात सरकार ने कोई विरोध नहीं किया. क्योंकि गुजरात सरकार इस मामले मे सिर्फ और सिर्फ एक क़ानूनी प्रक्रिया का पालन कर रही है ..

एन आई ए की टीम ने संजीव भट्ट के उपर लगे सभी आरोपों की अपने स्तर पर जाँच की. गुजरात सरकार से उनको जितने भी कागजात चाहिए वे सब मुहैया करवाए. फिर एन आई ए की टीम दिल्ली लौटकर चिदम्बरम को अपनी रिपोर्ट सौपी, इस रिपोर्ट में क्या है ये तो किसी को नहीं पता लेकिन इस रिपोर्ट के बाद चिदम्बरम की बोलती जरुर बंद हों गयी ..चिदम्बरम ही नहीं बल्कि दूसरे कांग्रसी नेता भी अब चुप हों गए है.

अदालत मे संजीव भट्ट के खिलाफ क्या सुबूत पेश किये गए .

१- संजीव भट्ट के खिलाफ सबसे बड़ा सुबूत उनके मोबाईल की लोकेशन और उनकी कॉल डिटेल है .

भट्ट को एक कांस्टेबल को झूठे हलफनामे में हस्ताक्षर कराने के लिए धमकाने और दबाव डालने के आरोप में 30 सितंबर को गिरफ्तार किया गया था।

कांस्टेबल के डी पंत की ओर से कुछ महीने पहले दर्ज कराई गई प्राथमिकी के अनुसार, उसको भट्ट 16 जून की रात प्रदेश कांग्रेस चीफ और पोरबंदर से विधायक अर्जुन मोधवाडिया के आवास पर जबरजस्ती ले गए थे।

फोन कॉल के रिकॉर्ड बताते हैं कि मोधवाडिया ने पंत की ओर से कथित तौर पर हलफनामा तैयार करने वाले वकील को उस दिन मध्यरात्रि के बाद कई बार फोन किया और तड़के करीब तीन बजे एसएमएस भी भेजे।

फोन कॉल रिकॉर्ड तथा वकीलों और नोटरी के बयानों से पुष्टि होती है। यह दर्शाता है कि भट्ट के साथ ही कांग्रेस नेता भी अपराध को अंजाम देने में संलिप्त हैं।

जज ने भी जानना चाहा है मोधवाडिया जैसे बड़े कांग्रेस नेता को ऐसे वक्त पर एक मामूली कांस्टेबल पंत से बार बार मोबाईल पर बात करने की क्या जरूरत थी ?

क्या इससे ये इससे साबित होता है कि कांस्टेबल 'मनगढंत और झूठे' हलफनामे पर हस्ताक्षर करने का इच्छुक नहीं था।

पन्त ने ये भी आरोप लगाया कि कांग्रेस नेता ने उन्हें आश्वासन दिया था कि चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है और उन्हें भट्ट के निर्देशों को मानना चाहिए।

और मोदी सरकार बहुत जल्द गिर जायेगी फिर हम सरकार बनायेंगे .

२- संजीव भट्ट के उपर जितने भी पुराने आरोप लगे है वे सभी सही पाए गए है उन्हे किसी भी मामले मे अदालत से कभी राहत नहीं मिली ..

३- आखिर संजीव भट्ट १० साल तक चुप क्यों रहे ? उनके घर पिछले कई  सालो से कांग्रेसी नेताओ का आना जाना क्यों. ?????

Tuesday, October 4, 2011

आखिर इस देश की नीच मीडिया संजीव भट्ट की पूरी सच्चाई बताने से क्यों डरती है ??

कांग्रेस और विदेशी ताकतों के फेके टुकड़े पर पलने वाली भांड मीडिया आखिर संजीव भट्ट के बारे मे इस देश के सामने सिर्फ आधी सच्चाई ही क्यों दिखा रही है ? असल मे संजीव भट्ट एक "विसिल ब्लोव्वर " नहीं बल्कि कांग्रेस के हाथो खेलने वाले एक "खिलौना" भर है .. जैसे कोई बच्चा किसी खिलौने से सिर्फ कुछ दिन खेलकर उसे कूड़ेदान मे फेक देता है ठीक वही हाल कांग्रेस संजीव भट्ट का भी करने वाली है .. एक बार अमर सिंह से पूछ लो कांग्रेस क्या है ? लेकिन मीडिया जिस तरह से संजीव भट्ट को एक "नायक " दिखा रही है वो एक झूठ है और झूट के सिवाए कुछ नहीं है. मै आपको संजीव भट्ट के बारे मे सच बताता हूँ :-
1- जब ये जनाब 1996 मे बनासकाठा के एसपी थे तब इन्होने सिपाही पद की भर्ती मे बड़ा घोटाला किया था . इनके खिलाफ बड़े गंभीर आरोप लगे ..इन्होने भर्ती की पूरी प्रक्रिया को नकार दिया था और ना ही उमीदवारों के रिकार्ड रखे थे .

2- ये जनाब 2001 में राजस्तान [पाली ]का एक वकील सुमेर सिंह राजपुरोहित जो अपनी कार से अहमदाबाद आ रहा था उससे चेकिंग के नाम पर पैसे की मांग की थी जब उसने मना किया तो इन्होने उसके कर में 500 ग्राम हेरोइन बरामद बताकर उसे नार्कोटिक्स की गंभीर धाराओं में जेल में डाल दिया .. असल में उस वकील के पास उस वक्त कोई सुबूत नहीं था जिससे पता चले की वो एक वकील है .बाद में पाली बार एसोसियेसन की अपील पर राजस्थान हाई कोर्ट ने क्राईम ब्रांच से अपने अंडर जाँच करवाई तो संजीव भट्ट को दोषी पाया गया .. जिसके खिलाफ संजीव भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट में अपील किया जो आज भी चल रहा है. लेकिन भारत सरकार के मानवाधिकार आगोग ने अपनी जाचं में संजीव भट्ट को दोषी पाते हुए गुजरात सरकार को सुमेर सिंह राजपुरोहित को एक लाख रूपये हर्जाना अदा करके का हुक्कम दिया जो गुजरात सरकार के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के खाते से अदा किया गया .ये सारी घटनाये गुजरात दंगे से पहले की है .. ....

3-अहमदाबाद के पास अडालज में नर्मदा केनाल के करीब 2000 वार की सरकारी जमीन पर कब्जा करके बैठे है .. जब ये बात मीडिया में आई तो उन्होंने बताया की उन्होंने सुरम्य सोसाइटी में 1000 वार का प्लाट ख़रीदा है जो उनकी माँ के नाम है ..उन्होंने उस प्लाट की बाउंड्री करवा कर उनमे दो कमरे भी बनवा दिए लेकिन जब प्लाट को नापा गया तो वो 2000 वार का निकला . असल में इन्होने केनाल की तरफ सरकारी जमीन को भी अपने कब्ज्जे में ले लिया ..जब पत्रकारों ने उनसे पूछा की आपने अपने सम्पति डिक्लेरेशन में इस प्लाट का जिक्र क्यों नहीं किया तो वो चुप हो गए ..और मोदी सरकार पर उलटे ये आरोप लगाने लगे की उनको बदनाम किया जा रहा है ..

4- 1990 में जब संजीव भट्ट जी जाम नगर में डीएसपी थे तो पुलिस की पिटाई से एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई , संजीव भट्ट समेत छ अन्य पुलिस वाले आरोपी बनाए गए | ये केस आज भी जाम खंभालिया कोर्ट मे चल रहा है ..

5- ये जनाब लगातार 10 महीने तक डियूटी से अनुपस्थित रहे ..और सरकार की किसी भी नोटिस का जबाब नहीं दिया

6- इनके उपर एक कांस्टेबल के डी पंथ ने बहुत ही गंभीर आरोप लगाये है .. इन्होने मोदी के उपर लगाये गए आरोपों को और मजबूत करने के इरादे से पंथ का अपहरण करके गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष अर्जुन मोधवाडिया के बंगले पर ले गये और फिर वहा पर उससे जबरजस्ती कई फर्जी कागजो पर साइन करवाया .

7- इनके उपर गुजरात के सहायक अटार्नी जनरल का ई मेल हैक करके कई गोपनीय सुचनाये चुराने का केस दर्ज है ..जिसमे आई टी एक्ट भी लगाया गया है

8- इन्होने मोदी के उपर जिस मीटिंग मे मुसलमानों के उपर हमलेका आदेश देने का आरोप लगाया है तत्कालीन डीजीपी श्री के चक्रवर्ती ने कहा की संजीव भट्ट उस बैठक में शामिल ही नहीं थे जिसका जिक्र संजीव भट्ट ने एफिडेविट में किया है |

9- आखिर इनके एफिडेविट को सुप्रीम कोर्ट ने लेने से ही मना क्यों कर दिया ?

अब मै इस देश की मीडिया जो कांग्रेस के हाथो बिक चुकी है से कुछ सवाल क्या मेरे इन सवालों का जबाब देगी ?

1-आखिर मिडिया संजीव भट्ट या उनके पत्नी से ये क्यों नहीं पूछता कि, गुजरात दंगे के 10 साल के बाद क्यों अचानक अपना फर्ज याद आया ?

2-आखिर ये 10 साल तक चुप क्यों थे? क्या इनका जमीर 10 साल के बाद जगा जब रिटायरमेंट के बाद केद्र मे कांग्रेस के द्वारा बड़ा पद मिलने का लालच दिया गया?

3-और एक चौकाने वाला खुलासा हुआ है कि, सादिक हुसैन शेख नामक जिस नोटरी से तीस्ता ने गुजरात दंगों के फर्जी हलफनामे बनवाये, उसी नोटरी से संजीव भट्ट साहब ने भी अपना हलफनामा बनवाया. क्या ये इत्तेफाक है?

4- आज की तारीख मे कांग्रेस के द्वारा पंजाब मे 100 से ज्यादा पुलिस कर्मी आतंकवाद के दौरन मानवाधिकारों के हनन और फर्जी एन्काउंटर के आरोप मे कई सालो से जेल मे बंद है और कई पुलिस अधिकारी आत्महत्या तक कर चुके है .. जिसमे सबसे दुखद वाकया तरन तारन के युवा और कर्तव्यनिष्ठ एस एस पी श्री अजित सिंह संधू द्वारा चालीस मुकदमे से तंग आकर ट्रेन से आगे कूदकर आत्महत्या करना रहा है . फिर कांग्रेस किस मुंह से मोदी पर आरोप लगा रही है ?

असल मे संजीव भट्ट आज गुजरात कांग्रेस के नेताओ की वजह से जेल मे है ..जी हाँ ये सच है ..असल मे संजीव भट्ट बहुत ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति है .. उन्हें रिटायरमेंट के बाद केन्द्र सरकार मे कोई बड़ी नियुक्ति का लालच कांग्रेस के नेताओ ने दिया ..फिर ये पूरा खेल खेला गया ..कांग्रेस ये मान कर चल रही थी कि सुप्रीम कोर्ट मोदी पर एफ आई आर दर्ज करने का आदेश जरुर देगी और फिर मोदी को इस्थीपा देना पड़ेगा जिससे गुजरात मे बीजेपी कमजोर हों जायेगी .. कांग्रेस के नेताओ ने तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दिन पुरे गुजरात मे बाँटने के लिए कई कुवेंटल मिठाई तक इक्कठा कर लिया था . लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तब सब मुंह छिपाने लगे .

Thursday, September 29, 2011

अथ 2जी स्पेक्ट्रम कथा भाग 2

अथ 2जी स्पेक्ट्रम कथा भाग 1 (यहाँ क्लिक करें) से आगे जारी

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि किस तरह दयानिधि मारन ने, प्रधानमंत्री और GoM के अन्य सदस्यों की जानकारी में भिन्न-भिन्न तरह से नियमों को तोड़ा-मरोड़ा और अपनी पसंदीदा कम्पनी के पक्ष में मोड़ा, परन्तु प्रधानमंत्री ने कोई आपत्ति नहीं की -

मारन की कारगुज़ारियों को और आगे पढ़िये…

16)      जैसा कि मारन को “भरोसा”(?) था ठीक वैसी ही ToR शर्तें 7 दिसम्बर 2006 को सरकार द्वारा जारी कर दी गईं, जिसमें स्पेक्ट्रम की दरों पर पुनर्विचार को दरकिनार करने के साथ-साथ “क्षेत्रीय डिजिटल प्रसारण” हेतु स्पेक्ट्रम खाली छोड़ने हेतु शर्त शामिल की गई। सरकार एवं मंत्री समूह ने बिलकुल दयानिधि मारन एवं प्रधानमंत्री की “इच्छा के अनुरूप” ToR की शर्तों के कुल छः भागों को घटाकर चार कर दिया, जैसा कि मारन ने पेश किया था।

17) तत्काल दयानिधि मारन ने बचे हुए 7 लाइसेंस मैक्सिस को 14 दिसम्बर 2006 को बाँट दिये।

18) मई 2007 में दयानिधि मारन को दूरसंचार मंत्रालय से हटा दिया गया एवं बाद में 2007 में मैक्सिस की ही एक कम्पनी ने मारन बन्धुओं के सन टीवी में भारी-भरकम “निवेश”(?) किया।

सभी तथ्यों और कड़ियों को आपस में जोड़ने पर स्पष्ट हो जाता है कि दयानिधि मारन ने पहले जानबूझकर दूसरी कम्पनियों की राह में अडंगे लगाए, फ़िर अपनी मनमानी शर्तों के ToR दस्तावेज को पेश किया। यह भी साफ़ दिखाई दे रहा है कि मारन की तमाम गैरकानूनी बातों, और शर्तों को प्रधानमंत्री ने मंजूरी दी। स्वयं प्रधानमंत्री द्वारा गठित मंत्री समूह की सिफ़ारिशों को दरकिनार करके मारन की मनमानी चलने दी। मारन ने 2001 की दरों पर 2006 में 14 स्पेक्ट्रम लाइसेंस एक ही कम्पनी मैक्सिस को बेचे, डिशनेट एवं एयरसेल कम्पनी की “बाँह मरोड़कर” उन्हें प्रतियोगिता से बाहर किया गया। बदले में मैक्सिस कम्पनी ने सन टीवी को उपकृत किया।

इस पूरे खेल में प्रधानमंत्री ने कई जगहों पर मारन की मदद की –

अ) सबसे पहले मैक्सिस कम्पनी द्वारा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को 74% की मंजूरी (यह कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री की सहमति के बिना नहीं हो सकता)

ब) मैक्सिस को फ़ायदा पहुँचाने हेतु UASL की नई गाइडलाईनें जारी की गईं (यह भी मंत्रिमण्डल की सहमति के बिना नहीं हो सकता)

स) मैक्सिस कम्पनी के लिए स्पेक्ट्रम की दरें 2001 के भाव पर रखी गईं तथा सन टीवी को फ़ायदा देने के लिये “क्षेत्रीय डिजिटल प्रसारण” की शर्त दयानिधि मारन के कहने पर यथावत (28 फ़रवरी 2006 के प्रस्ताव के अनुरूप) रखी गई। (यह काम भी प्रधानमंत्री की सहमति और हस्ताक्षरों से ही हुआ)

यह बात भी काफ़ी महत्वपूर्ण है कि तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी को ही “क्षेत्रीय डिजिटल प्रसारण” हेतु स्पेक्ट्रम खाली करने की मंजूरी और अनुशंसा करनी थी, लेकिन उन्होंने इस फ़ाइल पर हस्ताक्षर नहीं किये और न ही कोई अनुशंसा की। इसलिये घूम-फ़िरकर वह फ़ाइल पुनः दूरसंचार मंत्रालय के पास आ गई, जिसे मारन और प्रधानमंत्री ने मिलकर पास कर दिया, यह सब तब हुआ जबकि स्वयं दूरसंचार मंत्री का परिवार एक टीवी चैनल का मालिक है।

कुल मिलाकर तात्पर्य यह है कि लाइसेंस देने की प्रक्रिया की शुरुआत से लेकर अन्त तक दयानिधि मारन ने जितनी भी अनियमितताएं और मनमानी कीं उसमें प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति, जानकारी और मदद शामिल है, ऐसे में प्रधानमंत्री स्वयं को बेकसूर और अनजान बताते हैं तो यह बात गले उतरने वाली नहीं है।

इसके बाद विपक्ष और मीडिया के काफ़ी हंगामों और प्रधानमंत्री द्वारा करुणानिधि के सामने हाथ जोड़ने के बाद आखिरकार दयानिधि मारन को दूरसंचार मंत्रालय से जाना पड़ा… लेकिन जाने से पहले दयानिधि मारन अपना खेल कर चुके थे। मारन के बाहर जाने के बाद ए राजा को दूरसंचार मंत्रालय दिलवाने के लिए कारपोरेट का जैसा "नंगा नाच" हुआ था उसे सभी सुधी पाठक और जागरुक नागरिक, "नीरा राडिया" के लीक हुए टेपों के सौजन्य से पहले ही जान चुके हैं, हमें उसमें जाने की आवश्यकता नहीं…

ए राजा ने भी दूरसंचार मंत्रालय संभालने के साथ ही अपनी गोटियाँ फ़िट करनी शुरु कर दीं…। 2G स्पेक्ट्रम घोटाले के सम्बन्ध में लगातार प्रधानमंत्री का यह दावा रहा है कि TRAI ने स्पेक्ट्रम नीलामी हेतु अनुशंसा नहीं की थी, उनका दावा यह भी है कि इस सम्बन्ध में वित्त मंत्रालय एवं दूरसंचार विभाग भी आपस में राजी नहीं थे। प्रधानमंत्री का कहना है कि वे कोई टेलीकॉम के विशेषज्ञ नहीं हैं इसलिए इस घोटाले की जिम्मेदारी एवं आरोप उन पर लागू नहीं होते हैं।

जबकि तथ्य कहते हैं कि प्रधानमंत्री इस समूचे 2G स्पेक्ट्रम घोटाले के सभी पहलुओं से अच्छी तरह वाकिफ़ थे, और ऐसा तभी से था, जबकि ए राजा ने इस मामले में विस्तार से लिखकर उन्हें दो पत्र भेजे थे (पहला पत्र भेजा गया 2 नवम्बर 2007 को और दूसरा 26 दिसम्बर 2007 को)। इन पत्रों में ए राजा ने सभी बिन्दुओं का जवाब भी दिया है तथा सभी महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर अनुशंसा की है एवं प्रधानमंत्री की राय भी माँगी है।

इसी प्रकार फ़ाइलों पर अफ़सरों की नोटिंग से भी स्पष्ट होता है कि वे भी अपनी खाल बचाकर चल रहे थे, और समझ रहे थे कि कुछ न कुछ "पक" रहा है, इसलिए वे फ़ाइलों पर अपने अनुसार समुचित नोट लगाते चलते थे… चन्द उदाहरण देखिये -

(चित्र फ़ाइल पेज 647)
नोट :-
इस मामले में भी आवेदनों की जाँच, एवं आवेदन प्राप्ति की तारीख अर्थात 25/09/2007 तक किये गये आवेदन और आवेदक कम्पनी की योग्यता की जाँच की जाये अथवा इसके बाद की दिनांक को भी कम्पनी की जाँच-परख को जारी रखा जाए, इस तथ्य को माननीय मंत्री महोदय के संज्ञान में लाया गया है।
हस्ताक्षर
निदेशक (AS-I)
उप-बिन्दु (3) - (iii)       वर्तमान परिस्थिति में जबकि UASL लाइसेंस हेतु 575 आवेदन प्राप्त किये जा चुके हैं, तथा TRAI (दूरसंचार नियामक) द्वारा अनुशंसा की गई है कि आवेदनों की संख्या पर कोई पाबन्दी नहीं लगाई जाये, ऐसे में पैराग्राफ़ 13 के दिशानिर्देशों पर गौर किया जाए। परन्तु माननीय संचार-तकनीकी मंत्री ने 25/09/2007 से पहले आवेदन कर चुकी “पात्र आवेदक कम्पनियो” को पहले ही सहमति-पत्र जारी करने सम्बन्धी यह निर्णय ले लिया है। जबकि वर्तमान परिदृश्य में बड़ी संख्या में आवेदन लंबित हैं एवं उन कम्पनियों की वैधता तथा योग्यता की जाँच-परख अभी बाकी है। संभवतः माननीय संचार मंत्री महोदय ने यह तय कर लिया है कि आवेदक कम्पनी की योग्यता जाँच, आवेदन की दिनांक के अनुसार की जाए।
फ़ाइल के पृष्ठ क्रमांक 648 पर टिप्पणी -  
दिनांक 14 दिसम्बर 2005 की UASL लाइसेंस की गाइडलाइन (पैराग्राफ़ 6) के अनुसार लाइसेंस प्राप्ति हेतु एण्ट्री फ़ीस (जो कि वापसी-योग्य नहीं होगी), सेवा क्षेत्र की कैटेगरी, FBG, PBG, कम्पनी की नेटवर्थ तथा शेयरों का इक्विटी कैपिटल, सभी सेवा प्रदाता क्षेत्रों के लिये आवश्यक है (संलग्नक-1 के अनुसार)। प्रत्येक सेवा प्रदाता क्षेत्र लाइसेंस के लिए एण्ट्री फ़ीस, FBG, PBG, नेटवर्थ की गणना उस सेवा क्षेत्र की कैटेगरी पर निर्भर करेगी, जिसके लिए लाइसेंस दिया गया है…

पृ ष्ठ 649 पर टिप्पणी है -

इस बात का कोई कारण समझ में नहीं आता कि इक्विटी सम्बन्धी नियमों को अलग-अलग क्यों लागू किया जाए। सभी लाइसेंस धारकों हेतु सेवा प्रदाता सर्कलों में लाइसेंस प्राप्ति हेतु लाइसेंस इक्विटी 138 करोड़ रुपये होना चाहिए, न कि 10 करोड़, जैसा कि UASL की सन 2005 की गाइडलाइनों में स्पष्ट बताया गया है।

अफ़सर आगे लिखते हैं : उचित आदेश जारी किया जाए… मैं इस सम्बन्ध में कोई भी टिप्पणी नहीं करना चाहता…
बी बी सिंह / 7-1-2008
फ़ाइल के पृष्ठ क्रमांक 650 की टिप्पणी -  
गत पृष्ठ से जारी… माननीय MoC&IT मंत्री महोदय के निर्देशों के अनुरूप इसे पुनः निरीक्षण किया जाए…
हस्ताक्षर
7/01/2008
फ़ाइल के इस पृष्ठ की अन्तिम टिप्पणी, जिसमें नीचे दो अफ़सरों के हस्ताक्षर हैं –
संशोधित प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी गई है। संशोधित विज्ञप्ति में अन्तिम पैराग्राफ़ विलोपित कर दिया गया है, जो कि इस प्रकार है – “हालांकि यदि एक से अधिक आवेदक कम्पनी सहमति-पत्रों की शर्तों पर उस दिनांक पर खरी उतरती है, तब भी प्राथमिकता के आधार पर आवेदन करने वाली कम्पनी की तारीख के आधार पर निर्णय किया जाएगा…”

इस संशोधन में माननीय मंत्री महोदय ने “x” नोट को भी हटा दिया है, क्योंकि उनके अनुसार नई शर्त के अनुसार यह आवश्यक नहीं है…
हस्ताक्षर
1) Dy.(AS-I)
2) ADG(AS-I)
10/01/2008
आगे जैसे-जैसे मंत्रालय के अफ़सरों के नोट के कागज़ात RTI के जरिये सामने आएंगे, तस्वीर और साफ़ हो जाएगी…। फ़िलहाल तो जाहिर है कि कई फ़ाइलों की नोटिंग तथा राजा-मारन के साथ हुई कई बैठकों, चर्चाओं के बारे में प्रधानमंत्री से लेकर अन्य सभी मंत्रियों को सब कुछ जानकारी थी, फ़िर भी कुछ नहीं किया गया…
दूरसंचार विभाग द्वारा एक जनहित याचिका के जवाब में 11 नवम्बर 2010 को उच्चतम न्यायालय में दाखिल किये गये हलफ़नामे में कई विरोधाभासी तथ्य उभरकर सामने आते हैं। वित्त सचिव तथा दूरसंचार सचिव के बीच दिनांक 22 नवम्बर एवं 29 नवम्बर 2007 के आपसी पत्रों, जस्टिस शिवराज पाटिल की रिपोर्ट, तथा सबसे महत्वपूर्ण यह कि 16 नवम्बर 2010 को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की जाँच में वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के कथन कि वित्त मंत्रालय और दूरसंचार विभाग के बीच ऐसी कोई सहमति नहीं बनी थी कि सन 2007 में लाइसेंस देते समय सन 2001 की स्पेक्ट्रम कीमतों पर ही लाइसेंस दिये जाएं।
निम्नलिखित सभी बिन्दुओं पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गम्भीर शंकाओं के घेरे में हैं -
1)     प्रधानमंत्री अपनी जवाबदेही से कैसे भाग सकते हैं, खासकर तब जबकि ए राजा ने कई गम्भीर अनियमितताएं एवं गैरकानूनी कार्य उस दौरान किये, जैसे –
अ)     लाइसेंस प्राप्ति हेतु आवेदन की अन्तिम तारीखों में गैरकानूनी रूप से बदलाव
ब)     TRAI एवं प्रधानमंत्री द्वारा राजस्व नुकसान से बचने के लिए बाजार मूल्य पर लाइसेंस की नीलामी के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना की गई।
(स)    कानून मंत्रालय की सलाह थी कि इस मामले को प्रधानमंत्री द्वारा गठित मंत्रियों की विशेष समिति में ही सुलझाया जाए, इसकी भी जानबूझकर अवहेलना की गई।
(द)    TRAI ने लाइसेंस आवेदनकर्ताओं की संख्या पर कोई बन्धन नहीं रखने की बात कही थी, परन्तु ए राजा ने चालबाजी से 575 आवेदनकर्ताओं में से सिर्फ़ 121 को ही लाइसेंस आवेदन करने दिया, क्योंकि राजा द्वारा आवेदन की अन्तिम तारीख को 1 अक्टूबर 2007 से घटाकर अचानक 25 सितम्बर 2007 कर दिया गया था।
(इ)    ए राजा द्वारा FCFS की मनमानी व्याख्या एवं नियमावली की गई ताकि चुनिंदा विशेष कम्पनियों को ही फ़ायदा पहुँचाया जा सके।
इस में से शुरुआती चार बिन्दुओं का उल्लेख 2 नवम्बर 2007 को ए राजा द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गए पत्र से ही साफ़ हो जाते हैं, जबकि अन्तिम बिन्दु की अनियमितता अर्थात FCFS की मनमानी व्याख्या ए राजा के 26 दिसम्बर 2007 के पत्र में स्पष्ट हो जाती है।
ऐसे में सवाल उठता है कि –
यदि प्रधानमंत्री अपनी बात पर कायम हैं, कि दूरसंचार विभाग और वित्त मंत्रालय स्पेक्ट्रम कीमतों को लेकर आपस में राजी थे तब तो तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदम्बरम भी, भारत सरकार को हुए राजस्व के नुकसान में बराबर के भागीदार माने जाएंगे। साथ ही इस बात की सफ़ाई प्रधानमंत्री कैसे दे सकेंगे कि वित्त सचिव के पत्र के अनुसार, 29 मई 2007 को ए राजा तथा वित्त मंत्री की मुलाकात हुई थी, जिसमें स्पेक्ट्रम की दरों पर चर्चा की गई (जबकि इन दोनों मंत्रियों की इस बैठक का कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं है)।
जबकि दूसरी तरफ़ – रिकॉर्ड के अनुसार CAG रिपोर्ट, जस्टिस पाटिल की रिपोर्ट, दूरसंचार विभाग के हलफ़नामे इत्यादि के अनुसार, यदि पी चिदम्बरम और वित्त मंत्रालय स्पेक्ट्रम की दरों को लेकर DoT  से कभी सहमत नहीं थे और उनके बीच कोई समझौता नहीं हुआ था, तब इस मामले में स्पष्टतः प्रधानमंत्री देश के समक्ष झूठ बोल रहे हैं उन्हें इस बात का जवाब देना होगा कि ऐसा उन्होंने क्यों किया?
राजा की सभी कार्रवाइयों, अर्थात्‌ कट-ऑफ तिथि को आगे बढ़ाना, इस मामले में ईजीओएम को पुनः संदर्भित करने के विधि मंत्री के अनुरोध को खारिज करना, नीलामी की बात को अस्वीकार करना, और यह जानते हुए भी कि 575 आवेदनों को देने के लिए पर्याप्त स्पेक्ट्रम उपलब्ध नहीं है, फिर भी ट्राई की नो कैप अनुशंसा को क्रियान्वित करने का दिखावा करना, इत्यादि गंभीर बातों से प्रधानमंत्री पूरी तरह से परिचित थे। हालिया नए साक्ष्य कहते हैं कि जनवरी/फरवरी 2006 में मारन के साथ हुई बातचीत के बाद प्रधानमंत्री ने 23 फरवरी 2006 को कैबिनेट सचिवालय को स्पेक्ट्रम मूल्य-निर्धारणों का ध्यान रखते हुए संदर्भ के शर्तों को जारी करने का निर्देश दिया।
कुल मिलाकर चाहे जो भी स्थितियाँ हों, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रधानमंत्री अच्छी तरह से जानते थे कि ए राजा क्या कारनामे कर रहे हैं, क्योंकि ए राजा ने अपने पत्रों में प्रधानमंत्री को सभी कुछ स्पष्ट कर दिया था, तथा राजा द्वारा सभी गैरकानूनी कार्य 10 जनवरी 2008 से पहले ही निपटा लिये गये थे…। प्रधानमंत्री को सब कुछ पता था, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की…
(भाग-2 समाप्त…)
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नोट :- (कुछ नए तथ्य एवं बातें प्रकाश में आईं तो सम्भवतः इस लेखमाला का तीसरा भाग भी आ सकता है…)
 (श्री सुरेश चिप्लूकर जी के ब्लॉग से)

Wednesday, September 28, 2011

प्रधानमंत्री ने किया राष्ट्र चिन्ह का अपमान

क्या भारत का राष्ट्रीय चिह्न प्रधानमंत्री की कुर्सी के पीछे उनके सिर के पीछे टेक... लगाने के लिए लगाया जा सकता है... कल 27 सितम्बर 2011 को जब मनमोहन सिंह प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे तो डीडी न्यूज़ के प्रसारण के दौरान ये मोबाइल से लिया गया फोटो है. जहां तक मुझे नज़र आ रहा है ये भारत का राष्ट्रीय चिह्न है... और अगर ये वाकई प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह के पीछे उनके सिर की टेक लगाने की जगह है तो ये अपमान की बात है... राष्ट्रीय चिह्न के लिए भी और देश के लिए भी... ये और भी अपमान का मुद्दा तब है कि जब प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर थे...

Tuesday, September 27, 2011

अथ 2जी स्पेक्ट्रम कथा भाग 1

2जी लाइसेंस देने की प्रक्रिया की शुरुआत से लेकर अन्त तक दयानिधि मारन ने जितनी भी अनियमितताएं और मनमानी कीं उसमें प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति, जानकारी और मदद शामिल है, ऐसे में प्रधानमंत्री स्वयं को बेकसूर और अनजान बताते हैं तो यह बात गले उतरने वाली नहीं है।

अथ 2G कथा भाग-1 प्रारंभ…

हमारे अब तक के सबसे "ईमानदार" कहे जाने वाले अनर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अक्सर भ्रष्टाचार का मामला उजागर होने के बाद या तो साफ़-साफ़ अपना पल्ला झाड़कर अलग हो जाते हैं, अथवा उनके "भाण्ड" टाइप के अखबार और पत्रिकाएं, उन्हें "ईमानदार" होने का तमगा तड़ातड़ बाँटने लगते हैं। प्रधानमंत्री स्वयं भी खुद को भ्रष्टाचार के ऐसे "टुटपूंजिये" मामलों से बहुत ऊपर समझते हैं, वे अपने-आप को "अलिप्त" और "पवित्र" बताने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते…। उनका "सीजर की पत्नी" वाला चर्चित बयान तो अब एक मखौल सा लगता है, खासकर उस स्थिति में जबकि लोकतन्त्र में जिम्मेदारी "कप्तान" की होती है। जिस प्रकार रेल दुर्घटना के लिए रेल मंत्री या कोई वरिष्ठ अधिकारी ही अपने निकम्मेपन के लिए कोसा जाता है। उसी प्रकार जब पूरे देश में चौतरफ़ा लूट चल रही हो, नित नये मामले सामने आ रहे हों, ऐसे में "सीजर की पत्नी" निर्लिप्त नहीं रह सकती न ही उसे बेगुनाह माना जा सकता है। मनमोहन सिंह को अपनी जिम्मेदारी निभानी ही चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं हो रहा। यदि डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी और सुप्रीम कोर्ट सतत सक्रिय न रहें और निगरानी न बनाए रखते, तो 2G वाला मामला भी बोफ़ोर्स और हसन अली जैसा हश्र पाता…

और अब तो जैसे-जैसे नए-नए सबूत सामने आ रहे हैं, उससे साफ़ नज़र आ रहा है कि प्रधानमंत्री जी इतने "भोले, मासूम और ईमानदार" भी नहीं हैं जितने वे दिखने की कोशिश करते हैं। दूरसंचार मंत्री रहते दयानिधि मारन ने अपने कार्यकाल में जो गुलगपाड़े किये उनकी पूरी जानकारी मनमोहन सिंह को थी, इसी प्रकार ए राजा (जो कि शुरु से कह रहा है कि उसने जो भी किया चिदम्बरम और मनमोहन सिंह की पूर्ण जानकारी में किया) से सम्बन्धित दस्तावेज और अफ़सरों की फ़ाइल नोटिंग दर्शाती है कि मनमोहन सिंह न सिर्फ़ सब जानते थे, बल्कि उन्होंने अपनी तरफ़ से इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया (हालांकि मामला उजागर होने के बाद भी वे कौन सा तीर मार रहे हैं?)। 2जी घोटाला (2G  spectrum  scam) उजागर होने के बावजूद प्रधानमंत्री द्वारा ए. राजा की पीठ सरेआम थपथपाते इस देश के लोगों ने टीवी पर देखा है…।
इस बात के पर्याप्त तथ्य और सबूत हैं कि ए राजा के मामले के उलट, जहाँ कि प्रधानमंत्री और राजा के बीच पत्र व्यवहार हुए और फ़िर भी राजा ने प्रधानमंत्री की सत्ता को अंगूठा दिखाते हुए 2G स्पेक्ट्रम मनमाने तरीके से बेच डाले… दयानिधि मारन के मामले में तो स्वयं प्रधानमंत्री ने इस आर्थिक अनियमितता में मारन का साथ दिया, बल्कि स्पेक्ट्रम खरीद प्रक्रिया में मैक्सिस को लाने और उसके पक्ष में माहौल खड़ा करने के लिये नियमों की तोड़मरोड़ की, कृत्रिम तरीके से स्पेक्ट्रम की दरें कम रखी गईं, फ़िर मैक्सिस कम्पनी को लाइसेंस मिल जाने तक प्रक्रिया को जानबूझकर विकृत किया गया। बिन्दु-दर-बिन्दु देखिए ताकि आपको आसानी से समझ में आए, देश को चूना कैसे लगाया जाता है… 

1)    दयानिधि मारन ने डिशनेट कम्पनी के सात लाइसेंस आवेदनों की प्रक्रिया रोके रखी –
दयानिधि मारन ने डिशनेट कम्पनी द्वारा प्रस्तुत लाइसेंस आवेदनों पर ढाई साल तक कोई प्रक्रिया ही नहीं शुरु की, कम्पनी से विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछ-पूछ कर फ़ाइल अटकाये रखी, यह बात शिवराज समिति की रिपोर्ट में भी शामिल है। मारन ने शिवशंकरन को इतना परेशान किया कि उसने कम्पनी में अपना हिस्सा बेच डाला।

2)    मैक्सिस कम्पनी को आगे लाने हेतु विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाई –
मैक्सिस कम्पनी को लाइसेंस पाने की दौड़ में आगे लाने हेतु दयानिधि मारन ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को बढ़ा दिया, यह कार्रवाई कैबिनेट की बैठक में 3 नवम्बर 2005 के प्रस्ताव एवं नोटिफ़िकेशन के अनुसार की गई जिसमें प्रधानमंत्री स्वयं शामिल थे और उनकी भी इसमें सहमति थी।

3)    मैक्सिस के लिये UAS लाइसेंस गाइडलाइन को बदला गया –
मारन ने मैक्सिस कम्पनी को फ़ायदा पहुँचाने के लिये लाइसेंस शर्तों की गाइडलाइन में भी मनमाना फ़ेरबदल कर दिया। मारन ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए यह शर्त रखी कि 14 दिसम्बर 2005 को भी 2001 के स्पेक्ट्रम भाव मान्य किये जाएंगे (जबकि इस प्रकार लाइसेंस की शर्तों को उसी समय बदला जा सकता है कि धारा 11(1) के तहत TRAI से पूर्व अनुमति ले ली जाए)। दयानिधि मारन ने इन शर्तों की बदली सिर्फ़ एक सरकारी विज्ञापन देकर कर डाली। इस बात को पूरी कैबिनेट एवं प्रधानमंत्री जानते थे।

इस कवायद का सबसे अधिक और एकमात्र फ़ायदा मैक्सिस कम्पनी को मिला, जिसने दिसम्बर 2006 में ही 14 नवीन सर्कलों में UAS लाइसेंस प्राप्त किये थे।

4)    मैक्सिस कम्पनी ने शिवशंकरन को डिशनेट कम्पनी से खरीद लिया था, और इस बात का उल्लेख और सबूत सीबीआई के कई दस्तावेजों में है, जिसे सुप्रीम कोर्ट में पेश किया जा चुका है।

5)    11 जनवरी 2006 को जैसे ही मैक्सिस कम्पनी ने डिशनेट को खरीद लिया, मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा जिसमें मंत्रियों के समूह के गठन की मांग की गई ताकि एयरसेल को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम आवंटित किया जा सके। मारन को पता चल गया था कि वह कम्पनी को लाइसेंस दे सकते हैं, लेकिन उन्हें स्पेक्ट्रम नहीं मिलेगा। दयानिधि मारन को पक्का पता था कि स्पेक्ट्रम उस समय सेना के पास था, तकनीकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का प्रभार होने के कारण दयानिधि मारन लाइसेंस के आवेदनों को ढाई वर्ष तक लटका कर रखे रहे, लेकिन जैसे ही मैक्सिस कम्पनी ने डिशनेट को खरीद लिया तो सिर्फ़ दो सप्ताह के अन्दर ही लाइसेंस जारी कर दिये गये। साफ़ है कि इस बारे में प्रधानमंत्री सब कुछ जानते थे, क्योंकि सभी पत्र व्यवहार प्रधानमंत्री को सम्बोधित करके ही लिखे गए हैं।

6)    मारन ने मैक्सिस कम्पनी को “A” कैटेगरी सर्कल में चार अतिरिक्त लाइसेंस लेने हेतु प्रोत्साहित किया। मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा उसके अगले दिन ही यानी 12 जनवरी 2006 को मैक्सिस (डिशनेट) ने “ए” कैटेगरी के सर्कलों के लिए 4 आवेदन डाल दिये, जबकि उस समय कम्पनी के सात आवेदन पहले से ही लम्बित थे। इस प्रकार कुल मिलाकर मैक्सिस कम्पनी के 11 लाइसेंस आवेदन हो गये।

7)    1 फ़रवरी 2006 को दयानिधि मारन स्वयं प्रधानमंत्री से व्यक्तिगत रूप से मिले, ताकि मंत्री समूह में उनके एजेण्डे पर जल्दी चर्चा हो।

8)    प्रधानमंत्री ने मंत्री समूह को चर्चा हेतु सन्दर्भ शर्तों (Terms of Reference) की घोषणा की तथा उन्हें स्पेक्ट्रम की दरों पर पुनर्विचार करने की घोषणा की –

11 जनवरी 2006 के पत्र एवं 1 फ़रवरी 2006 की व्यक्तिगत मुलाकात के बाद 23 फ़रवरी 2006 को प्रधानमंत्री ने स्पेक्ट्रम की दरों को तय करने के लिए मंत्री समूह के गठन की घोषणा की, जो कि कुल छः भाग में थी। इस ToR की शर्त 3(e) में इस बात का उल्लेख किया गया है कि, “मंत्री समूह स्पेक्ट्रम की दरों सम्बन्धी नीति की जाँच करे एवं एक स्पेक्ट्रम आवंटन फ़ण्ड का गठन किया जाए। मंत्री समूह से स्पेक्ट्रम बेचने, उस फ़ण्ड के संचालन एवं इस प्रक्रिया में लगने वाले संसाधनों की गाइडलाइन तय करने के भी निर्देश दिये। इस प्रकार यह सभी ToR दयानिधि मारन की इच्छाओं के विपरीत जा रही थीं, क्योंकि दयानिधि पहले ही 14 दिसम्बर 2005 को UAS लाइसेंस की गाइडलाइनों की घोषणा कर चुके थे (जो कि गैरकानूनी थी)। मारन चाहते थे कि UAS लाइसेंस को सन 2001 की दरों पर (यानी 22 सर्कलों के लिये सिर्फ़ 1658 करोड़) बेच दिया जाए।

9)    अपना खेल बिगड़ता देखकर मारन ने प्रधानमंत्री को तत्काल एक पत्र लिख मारा जिसमें उनसे ToR (Terms of References) की शर्तों के बारे में तथा ToR के नये ड्राफ़्ट के बारे में सवाल किये। प्रधानमंत्री और अपने बीच हुई बैठक में तय की गई बातों और ToR की शर्तों में अन्तर आता देखकर मारन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पूछा कि – “माननीय प्रधानमंत्री जी, आपने मुझे आश्वासन दिया था कि ToR की शर्तें ठीक वही रहेंगी जो हमारे बीच हुई बैठक में तय की गई थीं, परन्तु मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ है कि जो मंत्री समूह इस पर गठित किया गया है वह अन्य कई विस्तारित शर्तों पर भी विचार करेगा। मेरे अनुसार सामान्यतः यह कार्य इसी मंत्रालय द्वारा ही किया जाता है…”। आगे दयानिधि मारन सीधे-सीधे प्रधानमंत्री को निर्देश देते लगते हैं, “कृपया सभी सम्बद्ध मंत्रियों एवं पक्षों को यह निर्देशित करें कि जो ToR “हमने” तय की थीं (जो कि साथ में संलग्न हैं) उन्हीं को नए सिरे से नवीनीकृत करें…”। दयानिधि मारन ने जो ToR तैयार की, उसमें सिर्फ़ चार भाग थे, जबकि मूल ToR में छः भाग थे, इसमें दयानिधि मारन ने नई ToR भी जोड़ दी, “डिजिटल क्षेत्रीय प्रसारण हेतु स्पेक्ट्रम की अतिरिक्त जगह खाली रखना…”। असल में यह शर्त और इस प्रकार का ToR बनाना दूरसंचार मंत्रालय का कार्यक्षेत्र ही नहीं है एवं यह शर्त सीधे-सीधे कलानिधि मारन के “सन टीवी” को फ़ायदा पहुँचाने हेतु थी। परन्तु इस ToR की मनमानी शर्तों और नई शर्त जोड़ने पर प्रधानमंत्री ने कोई आपत्ति नहीं उठाई, जो सन टीवी को सीधे फ़ायदा पहुँचाती थी। अन्ततः सभी ToR प्रधानमंत्री की अनुमति से ही जारी की गईं, प्रधानमंत्री इस बारे में सब कुछ जानते थे कि दयानिधि मारन “क्या गुल खिलाने” जा रहे हैं।

10)      विदेशी निवेश बोर्ड (FIPB) द्वारा मैक्सिस कम्पनी की 74% भागीदारी को हरी झण्डी दी -मार्च-अप्रैल 2006 में मैक्सिस कम्पनी में 74% सीधे विदेशी निवेश की अनुमति को FIPB द्वारा हरी झण्डी दे दी गई। इसका साफ़ मतलब यह है कि न सिर्फ़ वाणिज्य मंत्री इस 74% विदेशी निवेश के बारे में जानते थे, बल्कि गृह मंत्रालय भी इस बारे में जानता था, क्योंकि उनकी अनुमति के बगैर ऐसा हो नहीं सकता था। ज़ा�����िर है कि इस प्रकार की संवेदनशील और महत्वपूर्ण जानकारी प्रधानमंत्री सहित कैबिनेट के कई मंत्रियों को पता चल गई थी। प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा इस तथ्य की कभी भी पड़ताल अथवा सवाल करने की कोशिश नहीं की गई कि मैक्सिस कम्पनी 99% विदेशी निवेश की कम्पनी थी, 74% विदेशी निवेश तो सिर्फ़ एक धोखा था क्योंकि बचे हुए 26% निवेश में सिर्फ़ “नाम के लिए” अपोलो कम्पनी के रेड्डी का नाम था। यह जानकारी समूची प्रशासनिक मशीनरी, मंत्रालय एवं सुरक्षा सम्बन्धी हलकों को थी, परन्तु प्रधानमंत्री ने इस गम्भीर खामी की ओर उंगली तक नहीं उठाई, क्यों?


11) अप्रैल से नवम्बर 2006 तक कोई कदम नहीं उठाया –
दयानिधि मारन चाहते तो 14 दिसम्बर 2005 की UAS लाइसेंस गाइडलाइन के आधार पर आसानी से मैक्सिस कम्पनी के सभी 14 लाइसेंस आवेदनों को मंजूरी दे सकते थे, परन्तु उन्होंने ऐसा जानबूझकर नहीं किया, क्योंकि ToR की शर्तों में “स्पेक्ट्रम की दरों का पुनरीक्षण होगा” भी शामिल थी। FIPB की विदेशी निवेश मंजूरी के बाद भी दयानिधि मारन ने लाइसेंस आवेदनों को रोक कर रखा। साफ़ बात है कि इन 8 महीनों में प्रधानमंत्री कार्यालय पर जमकर दबाव बनाया गया जो कि हमें नवम्बर 2006 के बाद हुई तमाम घटनाओं में साफ़ नज़र आता है।

12)      दयानिधि मारन ने ToR की शर्तों का नया ड्राफ़्ट पेश किया –
16 नवम्बर 2006 को दयानिधि मारन ने अवसर का लाभ उठाते हुए मंत्री समूह के समक्ष एक नया ToR शर्तों का ड्राफ़्ट पेश किया, जिसमें स्पेक्ट्रम की कीमतों के पुनरीक्षण वाली शर्त हटाकर क्षेत्रीय डिजिटल प्रसारण वाली शर्त जोड़ दी। इस प्रकार यह ToR वापस पुनः उसी स्थिति में पहुँच गई जहाँ वह 28 फ़रवरी 2006 को थी। ज़ाहिर है कि ToR की इन नई शर्तों और नये ड्राफ़्ट की जानकारी प्रधानमंत्री को थी, क्योंकि ToR की यह शर्तें प्रधानमंत्री की अनुमति के बिना बदली ही नहीं जा सकती थीं।  

13) इस बीच दयानिधि मारन ने अचानक जल्दबाजी दिखाते हुए 21 नवम्बर 2006 को मैक्सिस कम्पनी के लिये सात Letter of Intent (LoI) जारी कर दिये, क्योंकि मारन को पता था कि ToR की नई शर्तें जो कि 16 नवम्बर 2006 को नये ड्राफ़्ट में प्रधानमंत्री और मंत्री समूह को पेश की गई हैं, वह मंजूर हो ही जाएंगी। मैक्सिस कम्पनी के बारे में यह सूचना प्रेस और आम जनता को हो गई थी, परन्तु प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं किया।

14) दयानिधि मारन ने 29 नवम्बर 2006 को (यानी ठीक आठ दिन बाद ही) मैक्सिस कम्पनी को बचे हुए सात लाइसेंस आवेदनों पर LoI जारी कर दिया।

15) 5 दिसम्बर 2006 को मारन ने मैक्सिस को सन 2001 के भाव में सात लाइसेंस भी जारी कर दिये, क्योंकि मारन अच्छी तरह जानते थे कि मंत्री समूह अब ToR की नई शर्तों पर विचार अथवा स्पेक्ट्रम की दरों का पुनरीक्षण करने वाला नहीं है। मारन को स्वयं के बनाये हुए फ़रवरी और नवम्बर 2006 में पेश किये गये दोनों ड्राफ़्टों को ही मंजूरी मिलने का पूरा विश्वास पहले से ही था, और ऐसा प्रधानमंत्री के ठोस आश्वासन के बिना नहीं हो सकता था।

बहरहाल, इतने घोटालों, महंगाई, आतंकवाद और भ्रष्टाचार के बावजूद पिछले 7 साल में हमारे माननीय प्रधानमंत्री सिर्फ़ एक बार "आहत"(?) हुए हैं और उन्होंने अपने इस्तीफ़े की पेशकश की है… याद है कब? नहीं याद होगा… मैं याद दिलाता हूँ… "सीजर की पत्नी" ने कहा था कि "यदि अमेरिका के साथ भारत का परमाणु समझौता पास नहीं होता तो मैं इस्तीफ़ा दे देता…"। अब आप स्वयं ही समझ सकते हैं कि उन्हें किसकी चिंता ज्यादा है?
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(भाग -2 में जारी रहेगा…जिसमें RTI के तहत प्राप्त कुछ फ़ाइलों की नोटिंग एवं तथ्य हैं… तब तक मनन कीजिये…)

(श्री सुरेश चिप्लूकर जी के ब्लॉग से)

Monday, September 12, 2011

भारतीय हिन्दुओ को बंगलादेशी नागरिकता के लिए विवश किया जा रहा है!

(बंगलादेश निर्माण से पहले पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दू -नरसंहार का एक चित्र ... इस चित्र में पाकिस्तान आर्मी का एक जिहादी ये पहचान कर रहा है की ये हिन्दू है या मुसलमान)
बंगलादेश को कुछ विवादों के चलते भूमि दी जा रही है, जिसके बारे में अनजान रखा जा रहा है सबको | कोई समाचार पत्र छाप रहा है की केवल 60 एकड़ भूमि ही दी गई है ? किसी का छापना है की 600 एकड़ .... 140 एकड़ .... क्या है सत्य ... ? 

ये बात है तब की जब जेस्सौर (Jessore) के हिन्दू राजा और मुर्शिदाबाद के नवाब जुए में गाँव के गाँव हार जीत पर लगाया करते थे| 1947 के बंटवारे के बाद मुर्शिदाबाद भारत में आ गया और हिन्दू शहर जेस्सौर (Jessore) बंगलादेश में चला गया | कुछ द्वीपों का भी इतिहास ऐसा है की भारत और तत्कालीन पाकिस्तान के साथ सीमा विवाद निरंतर बना रहा | 

मार्शल टीटो समझौता

बंगलादेश और पाकिस्तान के साथ कोई प्राकृतिक सीमा नहीं है, जैसे की चीन और श्री लंका के साथ पाई जाती है, अतः सीमा विवाद भी होना आवश्यक था और वो भी ... इस्लामी मानसिकता के साथ | बंगलादेश की सीमा भारतीय राज्यों से लगती है ...पश्चिम बंगाल, असम और मेघालय UNO ने एक कमेटी बना कर भारत पाकिस्तान सीमा विवाद का हल करवाना चाह जिसकी अध्यक्षता कर रहे थे युक्रेन के निवासी मार्शल टीटो | 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद नेहरु और तत्कालीन पाकिस्तान शासक ने भी स्वीकृति दी और आगे जाकर याह्या खान आदि ने यह निर्णय लिया की मार्शल टीटो जो परामर्श देगा उसे हम मान लेंगे | मार्शल टीटो ने भी बड़ी कुशलता से षड्यंत्र रचते हुए यह परामर्श सुझा दिया की तत्कालीन तीस्ता नदी को ही सीमा मान लिया जाए, जिसको की उस समय तो मान लिया गया | परन्तु उस समय तीस्ता नदी में बाढ़ आई हुई थी जिस कारण से तीस्ता नदी ने कई जगहों से रास्ता बदला भी हुआ था और पानी भी भरा हुआ था |

इस्लामी मानसिकताओं के लालच का तो कोई अंत स्वाभाविक रूप से है ही नहीं, हजरत महामूत के Easy Money के सिद्धांत को तो अपने खून में बसा चुके हैं | तत्कालीन पाकिस्तान (बंगलादेश) की नीयत खराब हुई और उसने तत्कालीन बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों पर भी अपना कब्जा लेने को बार बार भारत पर दबाव बनाया, सीर क्रीक का विवाद भी आप सब पढ़ सकते हैं इस विषय पर |

वर्तमान समझौता 
 
वर्तमान समझौते के तहत ऐसे प्रतीत होता है की जैसे भारत ने ...अमेरिका जैसे देश के आगे घुटने टेक दिए हों क्योंकि Uncle Sam तो फिर भी दादागिरी के लिए मशहूर हैं, अपने एजेंटों से परमाणु संधि के लिए भारत के संसद तक खरीद लेते हैं वो तो ....परन्तु बंगलादेश जैसे भूखे नंगे दो कौड़ी की औकात न रखने वाले देश के आगे घुटने टेक देना भारतीय विदेश नीति के इस्लामीकरण की मानसिकता को दर्शाता है | ऐसा प्रतीत होता है जैसे भारत की विदेश नीति इस्लामी मानसिकता के लोगों द्वारा निर्धारित की जाती है | इस भूमि विवाद के विवादित समझौते के अंतर्गत एक बहुत बड़ा जनसँख्या परिवर्तन भी होने जा रहा है जिसके बारे में भारतीय जनमानस को इतिहास की तरह आज भी .... अँधेरे में ही रखा जा रहा है |

बंगलादेश के 1,70,000 मुसलमानों को भारत में शरण दी जाएगी जिनकी कुल भूमि है 5400 एकड़ |  और भारत के 30000 हिन्दुओं की 17500 एकड़ भूमि बंगलादेश को दी जा रही है | 12000 एकड़ भूमि दुसरे देश को दी जा रही है... इससे बड़ा धोखा या देशद्रोह नहीं हो सकता भारतीय जनमानस के साथ |

और साथ में भारत के हिन्दुओं के ऊपर एक शर्त भी थोपी गयी है की यदि आप भारत सरकार से अपनी भूमि पर कोई Claim नहीं करते हैं तो आप भारत में कहीं भी रह सकते हैं |

और यह भी प्रत्यक्ष है, साक्षी है, प्रमाणित है की ... जब ये हिन्दू लोग बंगलादेश के अधीन आएंगे तो अगले कुछ वर्षों में ही अधिकतर का धर्म-परिवर्तन भी करवा दिया जायेगा, और जाने कितनी महिलाओं को यौन-उत्पीडन के दौर से गुजरना होगा ?  

क्या यह ... हिटलर शाही का देश है ? प्रश्न फिर वही आता है की क्या यह सरकार और नीतियाँ .... भारतीय हैं ? किस लोकतंत्र और धर्म-निरपेक्षता की पक्षधर है ये लोकतंत्र के अंदर व्याप्त राजशाही ...? क्या आप लोग इसका विरोध कर सकते हैं ? यदि आज नहीं कर सकते तो तैयार रहिये आप भी किसी भी समय किसी भी इस्लामी देश के अधीन हो सकते हैं बिना किसी चल अचल सम्पत्ति के |

यहाँ कुछ  बातें  उल्लेक्ख्नीय है ...

•    न ही वेटिकन, चीन और सलीमशाही जूतियाँ चाटने वाली मीडिया द्वारा इस विषय पर कुछ विशेष दिखाया या छापा जा रहा है ?
•    विपक्ष द्वारा या किसी भी हिंदूवादी सन्गठन द्वारा कोई बड़ा आन्दोलन नहीं किया जा रहा ?
•    विपक्ष भी चुप ..... ? जाने कौन सी दवाई पिलाई हुई है आजकल विपक्ष को सरकार ने ?
•    भारतीय जनमानस तो पुरे विश्व में इतना महामूर्ख है की उसे न तो कुछ पढने की अब आदत है और न ही कुछ समझने की ... एक पैशाचिक मानसिकता खून में रच बस चुकी है ... "हमको क्या ?? "

महत्वपूर्ण ये है की इंदिरा गांधी ने 1980 में इस विवाद पर बंगलादेश को मिलेगी ... उतनी ही भूमि बंगलादेश यदि भारत को देता है .. उसी दिशा में यह समझौता पूर्ण हो सकता है अन्यथा नहीं | हालांकि बंगलादेश सरकार ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया था | परन्तु भारत की ऐसी कौन सी नब्ज़ है .... जो इस्लामी मानसिकता के मंत्रियों की उँगलियों के नियन्त्रण में है ? क्या भारत में पैदा होने वाले हिन्दुओं पर जयचंदी श्राप अनंत काल के लिए लग चुका है ? सब बिके हुए ही पैदा हो रहे हैं ?

भला किस प्रकार कुछ भारतीय हिन्दुओ को इस्लामी देश की नागरिकता लेने पर विवश किया जा सकता है ? और 12000 एकड़ भारतीय भूमि दुसरे देश को कैसे दी जा सकती है ? कृपया आप सब सुझाएँ .... क्या हो रहा है ? और आप सब क्या क्या कर सकते हैं ?

साभार:  प्रवीण आर्य