Friday, July 6, 2012

क्या वर्ण व्यवस्था का यही उद्देश्य था.....?????


आज हिन्दू समाज में जाति या वर्ण व्यवस्था .... निस्संदेह एक अभिशाप की तरह है..... और, एक कलंक है ....! परन्तु..... क्या सचमुच में ...... वर्ण व्यवस्था का यही उद्देश्य था.....?????

दरअसल जब कोई विशाल और भव्य भवन का निर्माण होता है तो, उसकी विशालता और भव्यता के लिए जो परिश्रम और रचनात्मकता लगती है वो ही कार्य दक्षता, इतिहास में विरासत के रूप में लिखी जाती है ..! परन्तु... जब उस विशाल और भव्य भवन की आवश्यकता पूर्ण हो जाती है ...... तथा वो बाहरी प्रभाव के कारण जर्जर हो जाती है और ढहने लगती है.... तो, उस समय के समाज के लिए वह भवन विशालता और भव्यता का कारण न बनकर दुर्घटना का कारण बन जाती है.... तथा भयावह हो जाती है ...! कमोबेश ... आज यही स्थिति भारत में हिन्दू समाज के वर्ण व्यवस्था की है ....!

कभी इसी वर्ण व्यवस्था ने भारत को शिखर पर पहुँचाया था.... परन्तु आज 1400 सालों की सामाजिक संकरण और बाहरी धर्मों की गन्दगी ने आज इसकी प्रासंगिकता को ख़त्म कर दिया है...... और, और जो जातीय प्रबंधन रुपी जंजीर कभी हमारे हिन्दू समाज के लिए कभी सुरक्षा प्रदान करती थी........ आज वही जातिवाद की जंजीरें हमारी बेड़ियाँ बन चुकी हैं ....! क्या आपने कभी जाति व्यवस्था के स्वर्णिम पहलुओं पर निष्पक्ष रूप से विचार किया है...?????? क्या आपने कभी सोचा है कि..... आखिर समाज में रहने और समाज के सर्वांगीण विकास के लिए जाति व्यवस्था क्यों आवश्यक थी..........????

इस बात को समझाने के लिए .... आज के सामाजिक परिदृश्य पर थोडा नजर दौडाएँ........!

आज के समाज में रेडियो 15 रुपये में मिल रहा है...... और, अरहर की दाल 80 रुपये में..... !!!!!!!! पिज्जा की होम डेलिवरी है...... और, चिकित्सा सुविधा का आज भी आभाव है........! भारत में आज लगभग 70 लाख लोग इंजीनियरिंग की पढाई कर रहे है ..... वहीँ दूसरी ओर .... सेना और रक्षा सेवाएँ प्रतिभा की तलाश में है..........!

आज लोग .... और समाजशास्त्री परेशांन हैं ....ऐसी सामाजिक अव्यवस्था से.....!!!!!!

ऐसा इसीलिए है कि.........भारत के हिन्दू सामाजिक सिद्धांतों के आधार पर जो जाति व्यवस्था बनी थी उसका मूल उद्देश्य समाज का चहुँमुखी विकास था ....! समाज में हर किसी का विकास हो ...... यही जाति व्यवस्था का लक्ष्य था..! और.... यही कारण है कि ..... हिन्दुओं ने कला, विज्ञान ,कृषि, रक्षा, सौंदर्य, खगोल, ज्योतिष, गणित ,साहित्य ....आदि सभी क्षेत्रों मे सामान रूप से विकास किया.... हर क्षेत्रों में एक नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए दुनिया में अपनी विजय पताका फहराई....!!

जरा सोचिये.............. जिस विकृत जाति व्यवस्था को हिन्दू समाज की बुराई के रूप में हमें परिभाषित किया गया और हमने मान लिया ....!यदि... भारत में आज भी जाति व्यवस्था के हिसाब से ही आज कार्य होता तो ..........बाटा, लिबर्टी जैसी कंपनियों में किसका अधिपत्य होता... और, उनमे काम कौन करता .....????

लुहार जाति के लोगों का ही अस्तित्व होता भारत की समस्त लौह सम्पदा पर ....ऐसे में इस्पात संयंत्रों में काम करने वाला अधिकारी, अभियंता, प्रबंधक कौन होता ....???

पूरे भारत में काम करने वाली समस्त दुग्ध उत्पादों , अमूल, पराग और मदर डेरी में हिन्दू यादवों का ही अधिपत्य होता ...... डेयरी तकनीक और अनुसन्धान हो या कोई भी शिक्षण समाज सब कुछ संरक्षित होता यादव समाज के लिए ....!

आज पूंजी के आधार पर टाटा तनिष्क .. और डी-डमास जैसी कंपनिया....सुनार समाज का रोजगार लील रही हैं ....परन्तु, यदि सुनार समाज भारत के सभी आभूषण कारोबार की देखरेख करते तो......... आप आसानी से समझ सकते हैं कि सुनार समाज कहाँ होता ...????

भारत के केवट समाज भी आधुनिक होकर भारतीय नेवी की रीढ़ बन गया होता ...!

ब्राह्मण समाज को आज समाज में पान की दुकान या राजनीति नहीं करनी होती ....अपितु कला साहित्य और विज्ञान क्षेत्र इनके अधीन होते ...!

क्षत्रिय समाज सेना और राजनीति के माध्यम से पूरे समाज में......... सबकी सुरक्षा कर रहे होते.....! राजनीति के प्रबंधक ,सेना के अधिकारी, अभियंता कृषि कार्य से सम्बंधित सभी कार्यों पर शुद्र समाज का अस्तित्व होता और समस्त भारत में सभी कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसन्धान संस्थानों के वैज्ञानिक और प्रोफ़ेसर भी इसी समाज से होते ...........!

यदि ऐसी संकल्पना होती तो पूरा हिन्दू भारतीय समाज सभी दिशाओं में विकास करता और कहीं कोई ... किसी भी प्रकार के आरक्षण का झगडा नहीं होता...! भारतीय हिन्दू समाज में जाति व्यवस्था आधारित संकल्पना बड़ी ही अनुपम और अद्वितीय थी ....! पीढ़ी दर पीढ़ी शोध और विकास चलता रहता था ... और हर समाज एक दुसरे से लाभान्वित होता था ...! परन्तु.... दुर्भाग्य से समय की धार और.... मुस्लिमों आक्रान्ताओं के लगातार हमलों ने हमारे हिन्दू समाज के इस अनुपम ताना-बाना को छिन्न-भिन्न कर दिया..... और .... हमारी ये अद्वितीय जाति व्यवस्था.... वरदान के बदले एक अभिशाप और कलंक बन गयी ...!


Disclaimer : इस लेख का उद्देश्य जाति व्यवस्था को बढ़ावा देना कतई नहीं है...... बल्कि , सभी जातियों को समाज के लिए महत्वपूर्ण और एकरूप बताना है...!

साथ ही लेख का उद्देश्य ये साबित करना है कि..... जाति व्यवस्था... किसी को बड़ा या छोटा बनाने के लिए नहीं बल्कि....... समाज के सर्वांगीण विकास के लिए बनायीं गयी थी...!
(मूल लेखक सतीश कुमार)

3 comments:

  1. गलत चीज का नतीजा सामने आ चुका है. अब तो गलती सुधार लो.
    वर्ण व्यवस्था की पैरोकारी से आप उनका आक्रोश कम नहीं कर सकते, जिन पर अत्याचार हुआ और धर्म बताकर हुआ.

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    1. सत्य गौतम जी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, मै वर्ण व्यवस्था की पैरोकारी नहीं कर रहा, और रही बात अत्याचार और वो भी धर्म बता कर, मै मानता हूँ पर वो अत्याचार धार्मिक कतई नहीं थे वो व्यक्तिगत थे धर्म की मन माफिक व्याख्या और पीड़ित वर्ग के असंघटित होने के कारण, जैसे मुल्लो और अंग्रेजो ने हमारी असंघटित होने का लाभ उठा हम सब पे अत्याचार किये तो क्या हम और आप आज भी मुल्लो या अंग्रेजो का बहिस्कार करते है ? किसी भी सभ्य समाज या कानून में पिता की गलतियों के लिए बेटे को फांशी देने का प्रवधान है क्या ? किसी भी अत्याचार से संघटित होकर ही लड़ा जाता है अगर आज इस तरह की हरकत कही भी होती है तो उस व्यक्ति को दंड दिलाने अथवा देने में मै आपके साथ हु.

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (08-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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